मनरेगा पर खर्च सीमा तय: पहली बार केंद्र सरकार ने लगाया खर्च पर अंकुश, रोजगार सृजन पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली, 10 जून 2025 — देशभर के ग्रामीण इलाकों में गरीब और बेरोजगार श्रमिकों को रोजगार की गारंटी देने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) पर केंद्र सरकार ने पहली बार खर्च सीमा निर्धारित कर दी है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वह वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) में केवल कुल वार्षिक बजटीय आवंटन का 60 प्रतिशत ही खर्च कर सकेगा।

अब तक मनरेगा एक मांग आधारित योजना रही है, जिसमें जरूरत के अनुसार सरकार फंड उपलब्ध कराती थी। लेकिन अब इस योजना को भी मासिक/त्रैमासिक व्यय योजना (MEP/QEP) के तहत लाया गया है, जो सरकार की ओर से खर्च पर नियंत्रण का एक तरीका है।

वित्त मंत्रालय ने भेजी चिट्ठी

29 मई 2025 को वित्त मंत्रालय द्वारा ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजी गई चिट्ठी में इस नई व्यवस्था से अवगत कराया गया। मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि मनरेगा के लिए अब निर्धारित सीमा से अधिक खर्च नहीं किया जा सकेगा। इस नई नीति के तहत, पहली दो तिमाहियों (अप्रैल-सितंबर) में सिर्फ ₹51,600 करोड़ ही खर्च किए जा सकेंगे, जबकि कुल वार्षिक आवंटन ₹86,000 करोड़ रुपये है।

खर्च नियंत्रण प्रस्ताव पर टकराव

सूत्रों के अनुसार, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने शुरुआत में वित्त मंत्रालय को मनरेगा के लिए अधिक खर्च की अनुमति मांगी थी, लेकिन बजट विभाग ने उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। इसके चलते अब शेष 40 फीसदी बजट अक्टूबर से मार्च के बीच खर्च किया जाएगा।

रोजगार सृजन पर संकट के बादल

जानकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह फैसला ग्रामीण इलाकों में रोजगार की उपलब्धता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, खासकर ऐसे समय में जब पहले से ही ₹21,000 करोड़ रुपये की देनदारियां लंबित हैं। इसके अलावा देश के कई हिस्सों में 100 दिन की रोजगार गारंटी को बढ़ाकर 150 दिन करने और दैनिक मजदूरी ₹400 करने की मांग जोर पकड़ रही है।

मनरेगा के तहत होते हैं ये प्रमुख कार्य

ग्रामीण सड़क निर्माण

जल संरक्षण

सिंचाई सुविधा सुधार

तालाब खुदाई और पुनरुद्धार

वृक्षारोपण

सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण

विपक्ष और सामाजिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया

इस फैसले के बाद विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने सरकार की आलोचना शुरू कर दी है। उनका कहना है कि यह कदम देश के गरीब तबके की आजीविका पर चोट है। जहां एक ओर रोजगार की जरूरत बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार व्यय पर अंकुश लगाकर अवसर सीमित कर रही है।