
नई दिल्ली/रायपुर। भारत के 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। अब देश की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं के अलावा क्षेत्रीय बोलियों में बनी फिल्मों को भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में शामिल किया जाएगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इसके लिए नियमों में संशोधन कर दिया है।
इस बदलाव के तहत अब किसी भी बोली में बनी फिल्म के लिए राज्य के गृह सचिव या जिला कलेक्टर से उस बोली के प्रचलन का प्रमाण पत्र लेना होगा। इसके बाद फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार की श्रेणी में मान्यता दी जाएगी।
इस बदलाव के पीछे छत्तीसगढ़ के कलाकार अखिलेश पांडेय का बड़ा योगदान बताया जा रहा है। अखिलेश पांडेय ने बताया कि जब उनकी छत्तीसगढ़ी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में जगह नहीं मिली, तब उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति और सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पत्र लिखकर इस विषय पर ध्यान दिलाया।
अखिलेश ने अपने पत्र में बताया था कि उनकी फिल्म ने दुनियाभर में 63 से अधिक अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीते हैं और उसका नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है, इसके बावजूद फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार की सूची में शामिल नहीं किया गया क्योंकि छत्तीसगढ़ी भाषा आठवीं अनुसूची में दर्ज नहीं थी।
उनकी इस पहल के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनका पत्र सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भेजा, जिसके बाद मंत्रालय ने नियमों में संशोधन करने का निर्णय लिया।
अब इस बदलाव से पूरे देश के क्षेत्रीय और लोकभाषा में फिल्म बनाने वाले कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान और सम्मान पाने का अवसर मिलेगा। अखिलेश पांडेय ने कहा कि यह निर्णय न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत के क्षेत्रीय फिल्म उद्योग के लिए गर्व का विषय है।
> “मेरे संघर्ष ने सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि उन सभी कलाकारों की आवाज को राष्ट्रीय मंच दिया है जो अपनी मातृभाषा और बोली में सिनेमा बनाते हैं,” — अखिलेश पांडेय, फिल्म कलाकार
