नई दिल्ली। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का ऐसा नारा है जिसने पूरे देश में आज़ादी की चिंगारी जगाई। इस गीत के रचयिता, महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत यह रचना 19वीं सदी में लिखी थी, जो बाद में भारतीयों के संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गई।
कैसे जन्म हुआ ‘वन्दे मातरम्’ का?
‘वन्दे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र ने 1870 के दशक में की थी। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में स्थान मिला। गीत में भारत माता को देवी-स्वरूप में दर्शाया गया है—एक ऐसी मां, जो समृद्ध, सुंदर और शक्तिशाली है। इस गीत का उद्देश्य उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन दबे भारतीयों में स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति और एकता की भावना जगाना था।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। इसके बाद 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत पूरे देश में गूंज उठा और स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख उद्घोष बन गया।
राष्ट्रीय गीत का दर्जा
स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ‘वन्दे मातरम्’ के पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज भी यह गीत देशभक्ति कार्यक्रमों और राष्ट्रीय उत्सवों में गर्व के साथ गाया जाता है।
कौन थे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय?
जन्म और शिक्षा
27 जून 1838 को बंगाल के कंथलपाड़ा में जन्मे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय आधुनिक बंगला साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय स्नातकों में शामिल थे। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की।
सरकारी सेवा
बंकिमचंद्र 1858 में अंग्रेज़ सरकार में उप-मैजिस्ट्रेट बने और लगभग 30 वर्षों तक सेवा में रहे। वे कठोर और न्यायप्रिय अधिकारी के रूप में जाने जाते थे।
साहित्यिक योगदान
बंकिमचंद्र ने बंगला साहित्य को नई दिशा दी।
उनके प्रमुख उपन्यास हैं—
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आनंदमठ
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कपालकुंडला
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दुर्गेशनंदिनी
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विषवृक्ष
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देवी चौधरानी
इनकी रचनाओं में देशप्रेम, समाज सुधार, धर्म और नारी शक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है।
देशभक्ति का प्रखर स्वर
बंकिमचंद्र सिर्फ साहित्यकार ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक भी थे। ‘वन्दे मातरम्’ उनकी उस सोच का प्रतीक है, जिसमें भारत को देवी का रूप देकर युवाओं में साहस और समर्पण का संचार किया गया।
निधन और विरासत
8 अप्रैल 1894 को बंकिमचंद्र का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी भारतीय चेतना को प्रेरित करती हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भावनात्मक नींव में बंकिमचंद्र और उनकी अमर रचना ‘वन्दे मातरम्’ का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
