बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला: पूरा पेनिट्रेशन साबित न हो तो दुष्कर्म नहीं, दुष्कर्म के प्रयास का मामला माना जाएगा

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी महिला के साथ पूरा पेनिट्रेशन (penetration) साबित नहीं होता है और केवल जननांगों को रगड़ने (rubbing) का कृत्य सामने आता है, तो उसे कानून की नजर में दुष्कर्म नहीं, बल्कि दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में रखा जाएगा।

इस फैसले के साथ ही हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा को घटाते हुए सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया है।

ट्रायल कोर्ट की सजा आधी की गई

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एनके व्यास ने कहा कि आरोपी का कृत्य गलत और गंभीर है, लेकिन मेडिकल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण पेनिट्रेशन साबित नहीं हो पाया। ऐसे में यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का नहीं, बल्कि दुष्कर्म के प्रयास का बनता है।

निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने आरोपी को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने आंशिक रूप से संशोधित किया।

धमतरी जिले का है मामला

यह मामला धमतरी जिले से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 21 मई 2004 को जब पीड़िता घर में अकेली थी, तब आरोपी उसे जबरन खींचकर अपने घर ले गया। वहां आरोपी ने पीड़िता और अपने कपड़े उतारे और उसकी मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की।

अभियोजन का आरोप है कि आरोपी ने पीड़िता को कमरे में बंद कर दिया, उसके हाथ-पैर बांधे और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। कुछ समय बाद पीड़िता की मां मौके पर पहुंचीं और उसे आरोपी के चंगुल से छुड़ाया।

IPC की धारा 376 और 342 में हुई थी सजा

घटना के बाद आरोपी के खिलाफ अर्जुनी थाना में एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने चालान पेश किया और 6 अप्रैल 2005 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376(1) (बलात्कार) और धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी।

इस फैसले को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।
उन्होंने कहा कि—

  • मेडिकल रिपोर्ट में जबरन यौन संबंध की पुष्टि नहीं हुई

  • पीड़िता का हाइमन सुरक्षित पाया गया

  • बयान दर्ज करने में देरी हुई

  • स्वतंत्र गवाह नहीं हैं

  • पीड़िता की उम्र को लेकर ठोस साक्ष्य नहीं हैं

राज्य सरकार की दलील

राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर मनीष कश्यप ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि—

  • पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए गए

  • जननांगों में लालिमा पाई गई

  • फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी रिपोर्ट ने भी शुक्राणु की पुष्टि की

पीड़िता के बयानों में विरोधाभास

हाई कोर्ट ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि—

  • प्रारंभिक बयान में पीड़िता ने पेनिट्रेशन की बात कही

  • बाद के बयान में कहा कि आरोपी ने करीब 10 मिनट तक अपना जननांग उसके जननांग पर रखा, लेकिन अंदर प्रवेश नहीं किया

मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर डॉ. आशा त्रिपाठी ने गवाही में बताया कि हाइमन नहीं फटा था और योनि में केवल अंगुली का पोर ही प्रवेश कर सकता था, जिससे पूर्ण पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं होती।

कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी का पीड़िता को जबरन ले जाना, कपड़े उतारना और उसके जननांगों पर अपने जननांग रगड़ना गंभीर और आपराधिक मंशा को दर्शाता है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसे दुष्कर्म नहीं बल्कि दुष्कर्म का प्रयास माना जाएगा।