बिलासपुर 04 अगस्त 2026 : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भारतीय सेना और पैरामिलिट्री बलों के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले सीआईएसएफ (CISF) कांस्टेबल को दी गई विभागीय सजा को सही ठहराते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विभाग द्वारा वेतन में कटौती (Salary Cut) की सजा अपराध की गंभीरता के अनुरूप है और इसमें न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का अधिकार सीमित है और विभागीय जांच में प्रक्रिया संबंधी गंभीर त्रुटि या अत्यधिक अनुचित दंड न होने की स्थिति में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
फेसबुक पोस्ट के बाद हुई थी विभागीय कार्रवाई
मामले के अनुसार, सीआईएसएफ के एक कांस्टेबल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर भारतीय सेना और पैरामिलिट्री बलों के संबंध में कथित रूप से आपत्तिजनक पोस्ट साझा की थी। विभाग ने इसे सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन मानते हुए उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की।
जांच पूरी होने के बाद संबंधित कर्मचारी को दोषी पाया गया और अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उसकी सैलरी में कटौती की सजा दी गई।
सजा के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा था कर्मचारी
विभागीय कार्रवाई से असंतुष्ट कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सजा को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि विभाग द्वारा दी गई सजा अनुचित है और उसे निरस्त किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने विभागीय जांच से जुड़े रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया।
हाईकोर्ट ने सजा को बताया उचित
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच नियमानुसार की गई है और उपलब्ध रिकॉर्ड में किसी प्रकार की प्रक्रियात्मक त्रुटि दिखाई नहीं देती। अदालत ने माना कि सोशल मीडिया पर सेना और सुरक्षा बलों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करना गंभीर अनुशासनहीनता है।
कोर्ट ने कहा कि वेतन में कटौती जैसी सजा इस प्रकार के दुर्व्यवहार के अनुपात में उचित है और इसे अत्यधिक या मनमाना नहीं कहा जा सकता।
अनुच्छेद 226 के दायरे पर कोर्ट की टिप्पणी
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट विभागीय जांच में अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका नहीं निभा सकता। यदि जांच निष्पक्ष तरीके से हुई हो और दंड पूरी तरह असंगत या अत्यधिक कठोर न हो, तो अदालत को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य केवल यह देखना है कि जांच प्रक्रिया कानून के अनुरूप हुई या नहीं, न कि विभाग के निर्णय का पुनर्मूल्यांकन करना।
