लोकसभा में बड़ा फैसला: ‘केरल’ से ‘केरलम’ हुआ नाम, हंगामे के बीच ध्वनिमत से बिल पारित

नई दिल्ली 11 अगस्त 2026 : लोकसभा ने मंगलवार को केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी. विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच सदन में बिना चर्चा के विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी सांसद इस दौरान अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी और प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह के जवाब की मांग कर रहे थे.

नित्यानंद राय ने अमित शाह की ओर से पेश किया विधेयक
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने गृह मंत्री अमित शाह की ओर से विधेयक को सदन में विचार और पारित करने के लिए पेश किया. उन्होंने बताया कि केरल की विधानसभा ने राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था. राज्य सरकार का तर्क था कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है, जबकि संविधान की पहली अनुसूची में इसे ‘केरल’ लिखा गया है.

2023 में भी पारित हुआ था प्रस्ताव

केरल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने अगस्त 2023 में राज्य का नाम बदलने को लेकर सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया था. इसके बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था. गृह मंत्रालय ने प्रस्ताव में कुछ तकनीकी बदलाव सुझाए थे. इसके बाद केरल की 15वीं विधानसभा ने 14 जून 2024 को फिर प्रस्ताव पारित कर केंद्र से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की मांग की.

क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 3?
संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को मौजूदा राज्यों के नाम बदलने का अधिकार देता है. इसके तहत संसद कानून बनाकर किसी राज्य का नाम बदला जा सकता है. केरल नाम परिवर्तन विधेयक पारित होने के बाद अब आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर राज्य का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ किए जाने का रास्ता साफ होगा.

हंगामे के बीच विपक्ष पर नित्यानंद राय ने साधा निशाना
विधेयक पारित होने के बाद नित्यानंद राय ने कहा कि हंगामे के बीच केरल से कांग्रेस के कुछ सांसद शायद विधेयक पेश किए जाने के समर्थन में अपना मत नहीं रख सके. उन्होंने कांग्रेस से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या पार्टी को केरल का नाम ‘केरलम’ किए जाने पर कोई आपत्ति है.

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कहा कि केरल से कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद केसी वेणुगोपाल को शोर-शराबे के कारण विधेयक पर अपनी बात रखने का मौका नहीं मिल सका, जिसका उन्हें दुख है.