रतन टाटा….. दो दशकों तक टाटा संस के चेयरमैन रहे, विवादों से भी रहा नाता

दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा का निधन हो गया है। बुधवार रात 86 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई के अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन से कारोबारी से लेकर मनोरंजन, राजनीति, खेल जगत तक शोक पसर गया है।

न्यूयार्क स्थित कार्नेल विश्वविद्यालय से 1962 में आर्किटेक्चर में बीएस की डिग्री हासिल करने के बाद रतन टाटा परिवार की कंपनी में शामिल हुए थे। शुरुआत में टाटा ग्रुप के कारोबारों का अनुभव प्राप्त करने के लिए उन्होंने शाप फ्लोर पर काम किया फिर 1971 में उनमें से एक नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रानिक्स कंपनी में प्रभारी निदेशक नामित हुए।

एक दशक बाद 1991 में उन्होंने अपने चाचा जेआरडी के स्थान पर टाटा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन का पद संभाला जो आधी सदी से भी अधिक समय तक प्रभारी रहे थे। यह वह वर्ष था जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खाली था और टाटा ने जल्द ही समूह को नमक से लेकर स्टील, कारों से लेकर सॉफ्टवेयर, बिजली संयंत्रों व एयरलाइंस तक के संचालन के साथ एक ग्लोबल पावर हाउस में बदल दिया।

दो दशकों तक टाटा संस के चेयरमैन रहे

वह दो दशकों से अधिक समय तक समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस के चेयरमैन रहे। इस दौरान समूह ने काफी विस्तार किया। वर्ष 2000 में लंदन स्थित टेटली टी को 43.13 करोड़ अमेरिकी डालर में अधिग्रहीत किया, 2004 में दक्षिण कोरिया के देवू मोटर्स के ट्रक-निर्माण संचालन को 10.2 करोड़ डालर में खरीदा, एंग्लो-डच स्टील निर्माता कोरस समूह को खरीदने के लिए 11.3 अरब डॉलर का भुगतान किया और फोर्ड मोटर कंपनी से ब्रिटिश कार ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर खरीदने के लिए 2.3 अरब डालर खर्च किए।

भारत के सबसे सफल व्यापारिक दिग्गजों में से एक होने के साथ-साथ वह अपनी परोपकारी गतिविधियों के लिए भी जाने जाते थे। पिछली सदी के आठवें दशक में उन्होंने आगा खान अस्पताल और मेडिकल कालेज परियोजना शुरू की थी। 1991 में टाटा संस के चेयरमैन रूप में नियुक्ति के बाद उन्होंने अपने परदादा जमशेदजी द्वारा स्थापित टाटा ट्रस्ट को आगे बढ़ाया और टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज जैसे उत्कृष्ट संस्थान स्थापित किए।