नई दिल्ली 17 जुलाई 2026 : देश में अब प्लास्टिक के नोट लाने की तैयारी है। इसके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक यानी आरबीआई ने पहल कर दी है। इसने प्लास्टिक नोट छापने के लिए ज़रूरी ‘ओपेसिफाइड पॉलिमर सब्सट्रेट शीट’ की सप्लाई करने वाली कंपनियों से वैश्विक स्तर पर निविदाएँ आमंत्रित की हैं। यह टेंडर निकाले जाने के बाद अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि ‘भ्रष्ट बीजेपी राज में अब नोटों का भी प्राइवेटाइजेशन हो जाएगा क्या? कमीशनख़ोरी का मॉडल इस हद तक गिर जाएगा, देश की जनता ने सोचा न था। जब देश की मुद्रा ही आत्मनिर्भर नहीं होगी तो अर्थव्यवस्था और देश आत्मनिर्भर कैसे होगा? अब क्या सरकार भी आउटसोर्सिंग पर दे दी जाएगी?’
अखिलेश ने एक्स पर पोस्ट कर कहा है, ‘इतने बड़े और संवेदनशील कार्य के लिए इतना छोटा कंजूसीभरा टेंडर निकालने के पीछे कहीं चुपके से औपचारिकता पूरा करने का कोई गलत मंसूबा तो नहीं है। लगता है सेटिंग पहले ही हो चुकी है, दिखाने को ख़ानापूर्ति की जा रही है। बीजेपी सरकार नहीं; मुनाफ़ाख़ोरों की भागीदार है।’
आरबीआई ने क्या क़दम उठाया है?
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का मोदी सरकार यह हमला तब आया है जब भारतीय रिजर्व बैंक ने ऐसे विशेष पॉलिमर सब्सट्रेट की सप्लाई के लिए अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से टेंडर मांगा है, जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक बैंक नोट बनाने में किया जाता है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि भारत भविष्य में कागज की जगह पॉलिमर यानी प्लास्टिक बैंक नोट अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालाँकि अभी आरबीआई या केंद्र सरकार की ओर से यह आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है कि कब से प्लास्टिक नोट जारी किए जाएंगे।
क्या होते हैं प्लास्टिक या पॉलिमर नोट?
भारत में अभी जो बैंक नोट चलते हैं, वे मुख्य रूप से कपास से बने विशेष कागज पर छापे जाते हैं। इसके विपरीत प्लास्टिक या पॉलिमर नोट विशेष सिंथेटिक प्लास्टिक सामग्री से बनाए जाते हैं। दिखने और छूने में ये सामान्य नोटों जैसे ही लगते हैं, लेकिन इनमें आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्लास्टिक नोटों के क्या होंगे फायदे?
पॉलिमर नोटों के कई फायदे होते हैं। ये ज्यादा टिकाऊ होते हैं। कागज के नोट जल्दी फट जाते हैं, गीले हो जाते हैं और घिस जाते हैं। वहीं प्लास्टिक नोट पानी से खराब नहीं होते, आसानी से नहीं फटते, लंबे समय तक चलते हैं, बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम पड़ती है। इससे नोट छापने की लागत भी घट सकती है।
प्लास्टिक नोटों में ट्रांसपैरेंट विंडो, एडवांस होलोग्राम, विशेष सुरक्षा लेयर, माइक्रो प्रिंटिंग जैसे कई आधुनिक सुरक्षा फीचर जोड़े जा सकते हैं। इनकी नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल माना जाता है।
कई देशों में पहले से चल रहे हैं पॉलिमर नोट
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम और कई अन्य देशों में पहले से पॉलिमर बैंक नोट चलन में हैं। इन देशों का अनुभव रहा है कि प्लास्टिक नोट अधिक समय तक टिकते हैं और नकली नोटों की समस्या कम होती है।
भारत में पहले भी हुआ था प्रयोग
भारत में पॉलिमर नोटों पर चर्चा कोई नई बात नहीं है। क़रीब एक दशक पहले भी सरकार और आरबीआई ने सीमित स्तर पर प्लास्टिक नोटों के परीक्षण की योजना बनाई थी, लेकिन वह बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो सकी। अब नए टेंडर के बाद माना जा रहा है कि आरबीआई एक बार फिर इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अभी आधिकारिक घोषणा का इंतज़ार
फिलहाल आरबीआई ने केवल पॉलिमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किया है। यह साफ़ नहीं किया गया है कि प्लास्टिक नोट कब जारी होंगे, किन मूल्य वर्गों में आएंगे और उनका उपयोग किस चरण में शुरू किया जाएगा।
लेकिन इस टेंडर ने राजनीतिक बहस ज़रूर छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ यूज़र इसे नोटों के टिकाऊपन और सुरक्षा का हवाला देते हुए बेहद अच्छी पहल बता रहे हैं तो कुछ लोग इसके पीछे साज़िश देखते हैं। संतोश पाठक ऑफिशियल नाम के एक यूज़र ने लिखा है, ‘नोटबंदी की तरह मोदी सरकार और आरबीआई इस देश की अर्थव्यवस्था के साथ एक बार फिर से बड़ा खिलवाड़ करने जा रही है। एक ही तर्क को बार-बार दोहरा कर (कि जाली नोट नहीं बन पाएंगे) आम जनता को भरमाने की कोशिश की जाती है। पता नहीं लोग प्लास्टिक वाले नोट को जेब या पर्स में कैसे रख पाएंगे?’
