नई दिल्ली 14 सितम्बर 2026 : हिंदू धर्म में भगवान Ganesh’ को प्रथम पूज्य माना जाता है। यही वजह है कि किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ, विवाह, गृह प्रवेश या नए काम की शुरुआत से पहले सबसे पहले गणपति का स्मरण और पूजन किया जाता है। मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा करने से कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन आखिर गणेश जी को सबसे पहले पूजे जाने का अधिकार कैसे मिला? इसके पीछे भगवान शिव से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है।
गणेश जी को मिला था प्रथम पूज्य होने का वरदान
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बीच यह प्रश्न उठा कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। तब दोनों के बीच प्रतियोगिता रखी गई कि जो पूरे संसार का चक्कर लगाकर सबसे पहले वापस आएगा, उसे विजेता माना जाएगा।
कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर संसार की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। वहीं गणेश जी का वाहन मूषक था और उनका शरीर भी भारी था। उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की तीन बार परिक्रमा कर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
माता-पिता को माना पूरा संसार
जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने संसार की परिक्रमा क्यों नहीं की, तो गणेश जी ने कहा कि माता-पिता में ही संपूर्ण संसार का वास माना गया है। इसलिए उन्होंने शिव-पार्वती की परिक्रमा को ही संसार की परिक्रमा माना।
गणेश जी की बुद्धिमत्ता और भक्ति से भगवान शिव और माता पार्वती बेहद प्रसन्न हुए। कार्तिकेय के लौटने पर शिवजी ने गणेश जी को प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया।
शिवजी ने दिया विशेष वरदान
मान्यता है कि भगवान शिव ने गणेश जी को वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य या पूजा की शुरुआत गणेश जी की पूजा के बिना पूर्ण नहीं मानी जाएगी। इसी वरदान के कारण गणपति को प्रथम पूज्य देवता का स्थान मिला।
गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है, यानी वे भक्तों के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने वाले देवता माने जाते हैं। उनकी पूजा में बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभता की कामना की जाती है।
