छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की वर्ष 2008 की 12वीं बोर्ड परीक्षा में प्रदेश टॉपर बनाए जाने के चर्चित फर्जीवाड़ा मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश गणेश राम पटेल की अदालत ने छात्रा पोराबाई, स्कूल प्राचार्य, केंद्राध्यक्ष और एक शिक्षक को नकल व उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी का दोषी करार देते हुए सभी को पांच-पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
मामला वर्ष 2008 का है, जब सरस्वती शिशु मंदिर हायर सेकंडरी स्कूल, बिर्रा की छात्रा पोराबाई को 12वीं बोर्ड परीक्षा में राज्य में पहला स्थान मिला था। परिणाम जारी होने के कुछ समय बाद ही विषयवार अंकों की असामान्यता और उत्तर पुस्तिकाओं की लिखावट में अंतर को लेकर संदेह गहराया। इसके बाद माध्यमिक शिक्षा मंडल ने जांच के आदेश दिए।
तत्कालीन उप सचिव पीके पांडेय के निर्देश पर कराई गई विशेष जांच में उत्तर पुस्तिकाओं में ओवरराइटिंग, अलग-अलग हैंडराइटिंग और अंकों में छेड़छाड़ की पुष्टि हुई। जांच रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड ने सख्त रुख अपनाते हुए बिलासपुर संभागीय अधिकारी के माध्यम से पोराबाई सहित कुल नौ लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया था।
जांच में आरोप लगाया गया कि सुनियोजित साजिश के तहत उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी कर पोराबाई को जानबूझकर स्टेट टॉपर बनाया गया। हालांकि चांपा मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 27 दिसंबर 2020 को सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ 29 जुलाई 2021 को जांजगीर सेशन कोर्ट में अपील दायर की गई, जिस पर अब फैसला आया है।
अतिरिक्त लोक अभियोजक केदारनाथ कश्यप ने अदालत में उत्तर पुस्तिकाएं, जांच रिपोर्ट, गवाहों के बयान और बोर्ड अधिकारियों की रिपोर्ट पेश की। वहीं बचाव पक्ष ने मामले को संदेह के आधार पर की गई कार्रवाई बताया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि यह मामला साधारण लापरवाही का नहीं, बल्कि संगठित साजिश का है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इतनी बड़ी गड़बड़ी बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं थी। पोराबाई को इस फर्जीवाड़े की मुख्य लाभार्थी मानते हुए अन्य तीनों आरोपियों को साजिश का सक्रिय हिस्सा बताया गया।
इस मामले को लेकर तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा मंडल अध्यक्ष बीकेएस रे ने भी अहम खुलासा किया। उन्होंने बताया कि मेरिट लिस्ट देखने के बाद उन्होंने स्वयं टॉपर की उत्तर पुस्तिका मंगवाई थी।
बीकेएस रे के मुताबिक,
“जैसे ही मैंने उत्तर पुस्तिका देखी, समझ गया कि यह पूरी तरह फर्जीवाड़ा है। इतनी साफ-सुथरी कॉपी और अंग्रेजी के प्रश्नों के जवाब हाईलेवल अंग्रेजी में लिखे गए थे। गांव की एक सामान्य छात्रा इस स्तर पर उत्तर नहीं लिख सकती। उसी वक्त मुझे गड़बड़ी का अहसास हो गया था।”
करीब 17 साल पुराने इस चर्चित मामले में आए फैसले को शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा अहम निर्णय माना जा रहा है।
