एक देश, एक चुनाव की ओर बड़ा कदम, 2029 से लागू होने की संभावना

नई दिल्ली  11 जुलाई  2026 : देश में बार-बार होने वाले चुनावों के खर्च और प्रशासनिक बाधाओं को रोकने के लिए मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (एक देश, एक चुनाव) को लेकर एक बड़ी खबर आई है। संसद की संयुक्त समिति (Joint Committee of Parliament) इस सुधार को 2029 के आम चुनावों से पूरी तरह लागू करने के लिए एक मजबूत रूपरेखा तैयार करने में जुटी है।

हाल ही में गोवा में हुई समिति की बैठक के दौरान इसके अध्यक्ष और भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस ऐतिहासिक चुनावी सुधार को अमलीजामा पहनाने की तैयारियां जोरों पर हैं।

मुख्य बिंदु:

  • 2029 का लक्ष्य: संसदीय समिति विभिन्न मॉडलों की समीक्षा कर रही है ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ ही देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी एक साथ कराए जा सकें।

  • 99% नागरिक संगठनों का समर्थन: समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के अनुसार, अब तक गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, दिल्ली और उत्तराखंड सहित कई राज्यों के दौरों में लगभग 99% नागरिक संगठनों (Civil Society), शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया है।

  • 7 लाख करोड़ का नुकसान बचेगा: पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति के सामने पेश की गई आर्थिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि अलग-अलग चुनाव कराने से देश की अर्थव्यवस्था को करीब ₹7 लाख करोड़ का भारी नुकसान होता है। एक साथ चुनाव होने से इस पैसे की बचत होगी, जिससे देश का विकास तेज होगा।

क्यों जरूरी है यह बदलाव? चौधरी ने गिनाए तर्क

संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी  ने बताया कि बार-बार चुनाव होने से न केवल देश का पैसा पानी की तरह बहता है, बल्कि विकास कार्य भी पूरी तरह ठप हो जाते हैं।

1. आचार संहिता और विकास की रुकावट: जब भी किसी राज्य में चुनाव होते हैं, तो वहां आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है, जिससे जनकल्याणकारी योजनाएं और नीतियां अटक जाती हैं। चूंकि आज हमारी अर्थव्यवस्था पूरी तरह इंटरकनेक्टेड है, इसलिए एक राज्य के चुनाव का असर दूसरे राज्यों के व्यापार और पर्यटन पर भी पड़ता है।

2. बच्चों की पढ़ाई का नुकसान: चुनावों में बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षकों की ड्यूटी (जैसे- वोटर लिस्ट तैयार करना, ट्रेनिंग और पोलिंग ड्यूटी) लगाई जाती है। इससे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होती है, जिसका सबसे बुरा असर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों पर पड़ता है।

क्या है 2029 का फॉर्मूला और चुनौतियां?

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कमेटी की सिफारिशों और संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 के तहत सरकार एक विशेष ‘ट्रांजिशन मॉडल’ पर काम कर रही है:

  1. कार्यकाल का सामंजस्य: 2029 के लक्ष्य को पाने के लिए कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त या थोड़ा विस्तारित करना पड़ सकता है, जिसके लिए व्यापक संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी। हालांकि, यदि कोई राज्य स्वेच्छा से तैयार हो, तो 2029 से पहले भी चुनावी चक्र को सिंक्रोनाइज (एक साथ) किया जा सकता है।

  2. त्रिशंकु सदन की स्थिति में नियम: अगर 2029 के बाद केंद्र या किसी राज्य की सरकार बीच में ही गिर जाती है, तो वहां दोबारा चुनाव तो होंगे, लेकिन नई सरकार पूरे 5 साल के लिए नहीं बल्कि केवल बचे हुए कार्यकाल (Unexpired Term) के लिए ही बनेगी, ताकि चुनावी चक्र न टूटे।

आगे की राह:

समिति का कहना है कि इस चुनावी सुधार का उद्देश्य 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। फिलहाल समिति सभी राजनीतिक दलों के साथ अनौपचारिक और औपचारिक बातचीत कर रही है ताकि संसद में इस बिल को पेश करने से पहले एक आम सहमति (Broad Consensus) बनाई जा सके।