नई दिल्ली 25 जून 2026 : अगर आप आने वाले महीनों में हवाई यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. वैश्विक स्तर पर बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन, जेट फ्यूल की सीमित सप्लाई और रिफाइनरियों पर बढ़ते दबाव के कारण एयरलाइंस की लागत में तेज बढ़ोतरी हो रही है. इसका सीधा असर विमान टिकटों की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि मौजूदा हालात बने रहते हैं तो एयरफेयर में 20 से 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है.
मैकिन्से की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गर्मियों के ट्रैवल सीजन से पहले जेट फ्यूल की मांग तेजी से बढ़ रही है, जबकि वैश्विक स्तर पर इसका स्टॉक घटा हुआ है. इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और जेट फ्यूल के उत्पादन में कमी ने बाजार में सप्लाई का संकट पैदा कर दिया है. यही वजह है कि जेट फ्यूल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, जेट फ्यूल की कीमतों को समझने के लिए “क्रैक स्प्रेड” एक अहम संकेत है. यह कच्चे तेल और उससे तैयार होने वाले फ्यूल प्रोडक्ट्स की कीमतों के बीच का अंतर दिखाता है. आमतौर पर जेट फ्यूल का क्रैक स्प्रेड 20 डॉलर प्रति बैरल या उससे कम रहता था, लेकिन अब इसके 2026 में 50 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की आशंका जताई गई है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के करीब 40 फीसदी जेट फ्यूल की सप्लाई खाड़ी क्षेत्र और एशिया के प्रमुख निर्यातक देशों से होती है. लेकिन हाल के जियोपॉलिटिकल घटनाक्रमों और सप्लाई संबंधी चुनौतियों के कारण इन क्षेत्रों से उत्पादन प्रभावित हुआ है. इसके अलावा चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए जेट फ्यूल के निर्यात पर आंशिक प्रतिबंध लगाए हैं. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता और कम हो गई है. दूसरी ओर, कई बड़ी रिफाइनरियां पहले से ही उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं, जिसके कारण उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश सीमित रह गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होरमुज स्ट्रेट से टैंकर यातायात सामान्य स्तर पर लौटता है, तो जेट फ्यूल की कीमतों पर कुछ दबाव कम हो सकता है. हालांकि, कई देश अपने रणनीतिक भंडार को फिर से भरने में जुटे हैं. ऐसे में कीमतें कुछ समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में वैश्विक इन्वेंट्री ही मांग और सप्लाई के बीच संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. लेकिन यदि स्टॉक और घटता है, तो कीमतों में और तेजी आ सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, किसी एयरलाइन टिकट की कुल लागत में ईंधन का हिस्सा लगभग 30 फीसदी होता है. ऐसे में यदि जेट फ्यूल की लागत दोगुनी हो जाती है और एयरलाइंस इसका अधिकांश बोझ यात्रियों पर डालती हैं, तो टिकटों के दाम 20 से 25 फीसदी तक बढ़ सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी रूट पर टिकट का औसत किराया 10,000 रुपये है, तो वह बढ़कर 12,000 से 12,500 रुपये तक पहुंच सकता है. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह की उड़ानों पर इसका असर देखने को मिल सकता है.
