नई दिल्ली 14 अगस्त 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने देश में पैकेट बंद खाने-पीने की चीजों पर सामने की तरफ चेतावनी लेबल लगाने में देरी करने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एफएसएसएआई) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूछा है कि क्या एफएसएसएआई बड़ी कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों के दबाव में आकर देश के लोगों और बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। जजों ने कहा कि कंपनियों के फायदे या नुकसान को लोगों की सेहत से बड़ा नहीं माना जा सकता।
इस देश के लोगों, खासतौर पर छोटे बच्चों का सेहतमंद रहना ज़्यादा ज़रूरी है। सुनवाई के अंत में कोर्ट ने एफएसएसएआई को अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर एफएसएसएआई खुद सही और सख्त फैसला नहीं ले पाता है, तो वह खुद अपनी तरफ से कड़ा आदेश जारी करेगा। कोर्ट ने जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की वह एफओपीएल (फ्रंट ऑफ पैकेट वार्निंग लेबल) से जुड़ा है। आसान भाषा में कहें तो यह खाने की चीज़ों के पैकेट में ज़्यादा वसा (सैचुरेटेड फैट), चीनी या नमक की मात्रा के बारे में चेतावनी देने का मामला है.
इस साल फरवरी में कोर्ट ने पैकेट के सामने साफ चेतावनी लिखने को लेकर कदम उठाने के लिए कहा था। कोर्ट का मानना था कि इस तरह का निशान देख कर लोग सामान खरीदते समय सही और सेहतमंद चीज चुन सकेंगे। सुनवाई में एफएसएसएआई ने बताया कि उसने कंपनियों और दूसरे संबंधित पक्षों से इस बारे में चर्चा की थी। उनका मानना है कि लाल निशान या चेतावनी देखकर लोग डर जाएंगे। एफएसएसएआई ने सुझाव दिया कि इस तरह की चेतावनी की जगह एक छोटा चार्ट या टेबल देना बेहतर होगा। इस चार्ट में भारतीय लोगों के लिए तय मानक के हिसाब से दिन भर की सीमा बताई जाएगी। जस्टिस जेबी पारडीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बैंच ने इस सुझाव को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एफएसएसएआई लोगों को यह बताने की बात कह रहा है कि उन्हें दिन भर में ज़्यादा से ज़्यादा 25 ग्राम चीनी, 10 ग्राम फैट और 5 ग्राम नमक लेना चाहिए। इस तरह ग्राहक दुकान पर खड़ा होकर हिसाब लगाता रहेगा कि उसे क्या और कितना खाना है। इससे चेतावनी देने का असली मकसद ही खत्म हो जाएगा।
